गरूड पुराण कथा पञ्चम अध्याय हिन्दी में कर्मों के अनुसार सजा,रोग तथा जम्म मरण Garud Puran Chapter-5 in hindi

जय श्री कृष्ण दोस्तों आज हम गरुण पुराण Garuda Purana Chapter-5 in hindi के पञ्चम अध्याय हिन्दी में आपको बता रहे है। जिसमें यमलोक मार्ग तथा वैतरणी नदी और जैसा कर्म वैसी सजा का प्रावधान बताया गया है। दोस्तों हिन्दू धर्म के वेद पुराण में गरूड पुराण एक है । गरुण पुराण Garuda Puranam हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला है और इसीलिए मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण की कथा Garud Puran Katha के श्रवण का प्रावधान है। इस पुराण में मनुष्य को पाप कर्मों से बचने का प्रावधान बताया गया है। इस गरुण पुराण के अधिष्ठातृ देव भगवान विष्णु माने जाते हैं। (भगवान विष्णु तथा गरुड़ के संवाद में गरुड़ पुराण – पापी मनुष्यों की इस लोक तथा परलोक में होने वाली दुर्गति का वर्णन, दश गात्र के पिण्डदान से यातना देह का निर्माण।) इसीलिए यह गरूड पुराण हमें सत्कर्मों को करने के लिए प्रेरित करता है।   गरूड पुराण प्रथम अध्याय हिन्दी // द्वितीय अध्याय / तृतीय अध्याय /चतुर्थ अध्याय 

गरूड पुराण कथा पञ्चम अध्याय हिन्दी में कर्मों के अनुसार सजा,रोग तथा जम्म मरण Garud Puran Chapter-5 in hindi

हिन्दी अर्थ गरुड़ पुराण पंचमोध्यायः गरुड़जी बोले – भगवन् ! जिन - जिन पापों से जो - जो चिह्न होते हैं और उनके कारण जिन - जिन योनियों में जीव जाते हैं , वह मुझसे कहिये ? ॥१ ॥ श्रीभगवान् कहते हैं- हे गरुड़ ! नरक से आये हुए प्राणी जिन पापों से जिन योनियों में जाते हैं और जिस पाप से जैसा चिह्न होता है , वह तुम मुझसे श्रवण करो || २ || ब्रह्महत्या करने वाला क्षयरोगी , गोहत्या करनेवाला मूर्ख और कुबड़ा , कन्या की हत्या करनेवाला कोढ़ी , इनको चाण्डाल योनियों में जानो || ३ || स्त्री का घात करनेवाला या गर्भपात करने ( करानेवाला ) भिल्ल रोगी , अयोग्य गमन करने से नपुंसक , गुरुपत्नी सेवन से चर्मरोगी , मांस खानेवाले का लाल अंग , मदिरा पीनेवाले के काले दाँत , जिह्वा के स्वाद से अभक्ष्य को भक्षण करनेवाला ब्राह्मण जलोदरी।।४- ५ ॥ ३ ॥ दूसरे को न देकर स्वयं मिष्ठान्न खानेवाले को कंठमाला , श्राद्धदिन में अशुद्धात्र देनेवाला श्वेतकुष्ठी , अभिमान से गुरु का अपमान करनेवाले को मिरगी , वेदशास्त्र की निन्दा करनेवाला पांडुरोगी , झूठी साक्षी देनेवाला गूँगा , पंक्तिभेद करनेवाला काणा , विवाह में विघ्न करनेवाले का होठ कटा होता है , पुस्तक की चोरी करने वाला जन्मान्ध , गौ तथा ब्राह्मण को लात मारनेवाला लंगड़ा तथा पंगु , मिथ्या बोलनेवाला हकला , मिथ्या बात सुननेवाला वधिर होता है , जहर देनेवाला मूर्ख तथा पागल होता है , अग्नि लगानेवाला खल्वाटी होता है , मांस बेचनेवाला दुर्भाग्यशाली होता है , मांस खानेवाला रोगी होता है , रत्नों की चोरी करनेवाला हीन जाति में उत्पन्न होता है , सुवर्ण की चोरी करनेवाले के नाखून अच्छे नहीं होते , धातुमात्र को हरनेवाला निर्धन होता है | ६-११ ॥ अन्न की चोरी करनेवाला मूषक , धान्य की चोरी करनेवाला शलभ , जल की चोरी करनेवाला चातक , विष की चोरी करनेवाला बिच्छू होता है ॥१२ ॥

हिन्दी अर्थ गरुड़ पुराणं पंचमोध्यायः शाकपत्र चोरी करनेवाला मोर , सुगन्ध वस्तु को चुरानेवाले छछुन्दर , शहद चोरी करनेवाला मधुमक्षिका , मांस चुरानेवाला गृद्ध , लवण चुरानेवाला पिपीलिका होता है || १३ || ताम्बूल , फल - पुष्पादिको हरनेवाला वन में वानर एवं जूता , तृण , काष्ठ , रूई आदि को चुरानेवाले मेषयोनि में उत्पन्न होते हैं || १४ || जो हिँसा कर्म से जीविका चलाते हैं तथा रास्ते में प्राणियों के धनादिको लूट लेते हैं , जीव हिंसा कर शिकार खेलते हैं , ये सब कसाइयों के घर में बकरा होते हैं | १५ || जो जहर पीकर मरते हैं , वे पर्वत पर कृष्ण सर्प होते हैं । जो किसी की आज्ञा में नहीं चलते ऐसे मदोन्मत्त निर्जन वन में हाथी होते हैं ॥ १६ ॥ ब्राह्मण होकर जो वैश्वदेव को नहीं करते , शूद्रादि , रजकादि सबके घर का अन्न भक्षण करते हैं और अन्न की परीक्षा न कर अन्न खाते हैं , वे ब्राह्मण निर्जन वन में व्याघ्र होते हैं || १७ || जो ब्राह्मण गायत्री का जप नहीं करते , सन्ध्योपासन नहीं करते , जो भीतर से दुष्ट हैं , बाहर से साधु मालूम होते हैं , वे ब्राह्मण अन्य जन्म में बगुला होते हैं || १८ || 

अयाज्य का दक्षिणा के लोभ से यज्ञादिक करानेवाले ब्राह्मण ग्रामसूकर होते हैं और बहुत मनुष्यों को यजन करानेवाले गधे की योनि में जन्म लेते हैं । निमंत्रण दिये बिना भोजन करनेवाले कौवे होते हैं || १ ९ || जो सुपात्र को विद्या का दान नहीं देते , वे ब्राह्मण बैल होते हैं । गुरु की सेवा नहीं करनेवाले दुष्ट पशु होते हैं || २० || गुरु को हुँकार - तुकार करे और वाद - विवाद कर ब्राह्मण को जीत ले , वह जलरहित वन में ब्रह्मराक्षस होते हैं ।॥ २१॥ जो पहले ब्राह्मण को वचन दे , अन्त में दान नहीं देते हैं , वे सियार होते हैं और सत्पुरुषों का सत्कार न करने वाला फेत्कार होता है अर्थात् जिनके मुख से अग्नि निकले || २२ || मित्रद्रोही पर्वत पर गृध्र होता है , क्रय - विक्रय में कपटी उल्लू होता है , वर्णाश्रम की निन्दा करनेवाला वन में कबूतर होता है || २३ || आशा का छेदन , स्नेह का छेदन , द्वेष विचारकर स्त्री का त्याग करनेवाले बहुत काल तक चक्रवाक पक्षी होते हैं || २४ || माता से , पिता से , गुरु से , बहिन से द्वेष करनेवाला हजारों जन्म- पर्यन्त गर्भ में मरण पाता है || २५ || सासु को गाली देनेवाली , नित्य कलह करनेवाली स्त्री जलौका ( जोंक ) होती है , स्वामी को कटुवचन कहनेवाली जूका ( जूँ ) होती है || २६ | 

हिन्दी अर्थ गरुड़ पुराणं पंचमोध्याय जो स्त्री पति को छोड़कर पर पुरुष का सेवन करती है , वह चमगीदड़ी , छिपकली या दो मुख की सर्पिणी होती है ॥२७ ॥ जो अपने गोत्र का घात करे या अपने सगोत्र स्त्री का सेवन करे तो वह लकड़बघ्या तथा शाही का जन्म पाकर फिर ऋक्ष योनि में उत्पन्न होता है ॥२८ ॥ तापस की स्त्री से गमन करने वाला मारवाड़ देश में भूत होता है , जिसकी युवा अवस्था नहीं हुई उसके साथ गमन करनेवाला वन में अजगर सर्प होता है ॥२ ९ ॥ गुरुपत्नी से गमन करनेवाला गिरगिट होता है , राजा की स्त्री का सेवन करनेवाला ऊँट होता है , मित्रपत्नी का सेवन करने वाला गधा होता है || ३० || गुदा कामसेवी सूअर और शूद्रासेवी बैल तथा महाकामी प्रायः अगले जन्म में अश्व होता है | ३१ || मृतक के अशौच में एकादशाह तक भोजन करने वाला कुत्ता होता है , देवद्रव्य भोक्ता देवलक ब्राह्मण को कुक्कुट ( मुर्गों ) की योनि प्राप्त होती है || ३२ || धन के लिये देवता की पूजा करनेवाला ब्राह्मण देवलक है । वह देव और पितृ - कार्यों में अयोग्य है।।३३ ।। में लोभ से यज्ञादिक करानेवाले ब्राह्मण ग्रामसूकर होते हैं और बहुत मनुष्यों को यजन करानेवाले गधे की योनि में जन्म लेते हैं । एस घार पापों से उत्पन्न हुए भयानक नरक को प्राप्त हो कर्मक्षय होने से मनुष्यलोक में उत्पन्न होते हैं।।३४ ।। ब्रह्महत्या करनेवाले नरक में दु : ख भोगकर पुनः इस मनुष्य लोक में गधा , ऊँट , महिष आदि की योनियों में उत्पन्न होते हैं , मदिरापान करनेवाला भेड़िया , कुत्ता , सियार आदि की योनियों को प्राप्त होता है ॥३५ ॥ सुवर्ण की चोरी करने वाला कृमि , कीट , पतंग होता है और गुरुपत्नी से गमन करने वाला तृण , गुल्म , लता आदि के रूप में जन्म धारण करता है।॥३६ ॥ परस्त्री को चुरानेवाला , किसी की धरोहर को ले लेनेवाला , ब्राह्मण का धन हरनेवाला नरक दुःख भोगने के पश्चात् ब्रह्मराक्षस होता है ॥३७ ॥ कपट से प्रेम रख ब्राह्मण के धन को भोगनेवाले का सात कुल नाश होता है और बलात्कार से या चोरी से ब्राह्मण के धन को भोगने वाले के कुल का नाश चन्द्रमा और तारागण रहें तब तक होता है || ३८ || लोहे के चूर्ण , पत्थर के चूर्ण तथा जहर आदि को प्राणी पचा सकता है किन्तु ब्राह्मण के धन को त्रिलोकी में स्थित कौन पुरुष पचा सकता है ? || ३ ९ ॥ 

हिन्दी अर्थ गरुड़ पुराणं पंचमोध्यायः राजा ब्राह्मण के धन को हर उस धन से अपनी सेना तथा हाथी , घोड़े आदि को रखे तो सब सेना युद्ध होते समय भाग जाती है , उसी प्रकार से जैसे बालू का पुल पानी बरसने से पूरा नष्ट हो जाता है ॥ ४०॥ देवद्रव्य - भक्षण से , ब्राह्मण के धन के हरण से , ब्राह्मण के कुल का अनादर करने से कुल का नाश होता है || ४१ || वेद - पुराण को पढ़ा हुआ ब्राह्मण अपने पास रहता हुआ उसको छोड़ जो अन्य दूसरे को दान देवे उसका नाम अतिक्रम है || ४२ || अपने पास रहता हुआ वेद से रहित ब्राह्मण उसको छोड़ विद्वान् ब्राह्मण को दान देने से अधिक दोष नहीं लगता - क्योंकि जलती अग्नि को छोड़ भस्म में होम कौन करता है ॥ ४३॥ हे गरुड़ ! ब्राह्मण का अतिक्रमण करनेवाला पुरुष सभी नरकों को भोगकर फिर इस मनुष्यलोक में जन्मान्ध तथा दरिद्री होता है । ४४॥ वह कभी दाता नहीं हो सकता , बल्कि सदैव भिखारी बना रहता है । ब्राह्मण की अपने द्वारा या अन्य द्वारा दी गयी भूमि का जो हरण करता है , वह साठ हजार वर्ष पर्यन्त विष्ठा का कीड़ा होता है ।। ४५॥ स्वयं 2. ब्राह्मण को दान देकर आप ही हरण करने वाला पापी पुरुष महाप्रलय तक नरक में जाता है ॥ ४६ ॥ - ब्राह्मण की जीविकार्थ पृथ्वी का दान देकर फिर उस पृथिवी की यत्न से रक्षा न करे , उसको हर ले तो वह लंगड़ा कुत्ता होता है ॥४७ ॥ ब्राह्मण को वृत्ति देनेवाला व्यक्ति लक्ष ( एक लाख ) गोदान का फल प्राप्त करता है और ब्राह्मण की | वृत्ति को हरनेवाला बंदर , कुत्ता तथा लंगूर होता है || ४८ ॥ हे गरुड़ ! पापी नरक के दुःखों को भोगकर फिर इस मनुष्यलोक में आकर अपने किये हुए कर्म के अनुसार अंधे , पंगु इत्यादि चिह्न से युक्त दिखाई देते हैं और कृमि , कुत्ता , पशु - पक्षी , चाण्डाल आदि योनियों में जाते हैं तथा महान् रोग से युक्त हो इन पूर्व में कही हुई योनियों में उत्पन्न होते हैं ॥४ ९ -५० ।। | तदनन्तर हजार जन्मपर्यन्त शरीर को प्राप्त कर पक्षी होते हैं । उस योनि में दृष्टि , शीत , ताप आदि का दुःख भोग शुभाशुभ कर्म भोगने के लिये मनुष्य जन्म पाते हैं ।।५१-५२ । इस क्रम से स्त्री और पुरुष के प्रसंग से जीव गर्भ के दुःखादि से मरण पर्यन्त दुःखों को भोगकर फिर मर जाता है ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ गरुड़ पुराण पंचमोध्यायः जन्म तथा मरण स्वेदज , उद्भिज , अंडज , जरायुज सब प्रकार के प्राणी शरीरधारी मात्र को होता है | इस संसार - चक्र की प्रवृत्ति ऐसी ही हो रही है ॥५४ ॥ जिस प्रकार रहट भ्रमण करता है , वैसे ही सर्वभूत प्राणी कर्मों के पाश से बँधे हुए मेरी मायाद्वारा भ्रमण करते हैं । कभी भूमि पर तो कभी नरक में जाते हैं ॥५५ ॥ अन्नदान न देने से दरिद्री होता है , दरिद्री होने से पाप करता है । उस पाप के प्रभाव से ( वह ) नरक में जाता है , फिर नरक से आकर दरिद्री होकर पाप करता है ॥५६ ॥ हे गरुड़ ! अपने किये हुए शुभाशुभ कर्म अवश्य भोगने पड़ते हैं । अनेक कल्प व्यतीत हो जाते हैं , फिर भी बिना भोगे कर्मों का नाश नहीं होता है । ५७ ॥

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